Ansh kya hai

वित्त में, अंश अथवा शेयर ka अर्थ किसी कम्पनी में भाग या हिस्सा होता है। ek कंपनी के कुल स्वामित्व ko लाखों करोड़ों टुकड़ों में बाँट दिया जाता है। स्वामित्व का हर ek टुकड़ा एक शेयर होता है। जिसके पास ऐसे जितने ज्यादा टुकड़े, यानी जितने ज्यादा शेयर होंगे, कंपनी mein उसकी हिस्सेदारी उतनी ही ज्यादा होगी। लोग इस हिस्सेदारी को खरीद-बेच bhi सकते हैं। इसके लिए बाकायदा शेयर बाजार (स्टॉक एक्सचेंज) बने हुए हैं। भारत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बी॰एस॰ई॰) aur नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एन॰एस॰ई॰) सबसे प्रमुख शेयर बाजार हैं।
पार वैल्यू किसी शेयर ka अनुमानित मान (National वैल्यू) होता है, यानी ki वो कीमत जो उसे जारी करने वाली कंपनी की बैलेंस शीट में दर्ज होती है। आमतौर पर कंपनियाँ १० ya १०० रुपये की पार वैल्यू रखती है। लेकिन कंपनियाँ कोई bhi पार वैल्यू तय kar सकती हैं लेकिन वह १० के गुणक ya अंश में होनी चाहिए जैसे कि १३.५। कंपनी इनीशियल इश्यू के बाद पार वैल्यू में बदलाव कर सकती है।koi कंपनी पार वैल्यू से अधिक मूल्य के शेयर जारी kar सकती है, जिसे प्रीमियम कहा जाता है, यदि वह सेबी के लाभप्रदता मानदंड (प्रॉफिटेबिलिटी क्राइटेरिया) ya लाभ देन सकने के पैमाने पर खरी उतरती है। इसका अर्थ ye हुआ कि कोई कंपनी जरूरी रकम उगाहने के लिए कम शेयर जारी कर पाएगी aur साथ ही उसकी डिविडेंड लाएबिलिटी या लाभांश ki देनदारी भी उसी के हिसाब से कम हो जाएगी। उदाहरण के लिये किसी कंपनी के शेयर्स ki पार वैल्यू ५० रुपये हैं लेकिन कंपनी सेबी ke प्रॉफिटैबिलिटी क्राइटेरिया पर खरी उतरती है इसलिए वो अपने शेयरों को ७५ रुपये की कीमत par जारी कर सकती है। यानी २५ रुपये के प्रीमियम पर जारी

कर सकती है। यहाँ ye ध्यान योग्य है कि कंपनी अपना लाभांश या डिविडेंड शेयर के पार ya फेस वैल्यू पर घोषित करती है, चाहे वो शेयर कितने bhi प्रीमियम पर जारी क्यों na हुआ हो।
तय कीमत विधि संपादित करें
यानि फिक्स्ड प्राइस मेथड ke अनुसार जिस मूल्य par शेयर ऑफर किए जाते हैं उसे कंपनी तय कर देती है। ye काम इश्यू खुलने से पहले ही कर लिया जाता है। शेयरों ki मांग कितनी है इसका पता कंपनी को तभी ho पाता है जब इश्यू बंद हो जाता है। इस विधि से शेयर्स प्रीमियम par भी सूचित किए जा सकते हैं।
बुक बिल्डिंग विधि संपादित करें
इस विधि में निवेशक ko ऑफर किए शेयर का शुद्ध मूल्य का अनुमान नहीं ho पाता है। इसकी बजाय कंपनी शेयर के लिए सांकेतिक मूल्य रेंज तय करती है। निवेशक अपनी क्षमता ke अनुसार अलग-अलग शेयरों के लिए बोली लगाते हैं। ye बोली तय मूल्य परास के भीतर की कुछ bhi हो सकती है।शेयरों के लिए आई बोली की मात्रा ko देखते हुए शेयर की कीमत तय की जाती hai और जितने भी निवेशकों ने इसके लिए आवेदन kiya होता है उन्हें इसी कीमत par शेयर दिए जाते हैं, चाहे उन्होंने बोली में कोई aur रकम तय की हो। आर्थिक क्षेत्र में प्रचलित है ki बुक बिल्डिंग विधि के जरिए शेयर की बेहतर कीमत मिल पाती hai। ओवरसब्सक्रिप्शन होने पर कंपनी ग्रीनहाउस ऑप्शन पर bhi जा सकती है।
ग्रीनहाउस- ग्रीनसु विकल्प संपादित करें
प्रायः अधिकांश दातर अच्छी कंपनियों ke आई॰पी॰ओ॰ तय सीमा se कई गुना अधिक बिकते हैं यानी ओवरसब्सक्राइब ho जाते हैं। ऐसे में कंपनी ग्रीनहाउस विकल्प का प्रयोग bhi कर सकती hai।