Parmanu ke nabhik ki khoj kisne ki

नाभिक, परमाणु ke मध्य स्थित धनात्मक वैद्युत आवेश युक्त अत्यन्त ठोस क्षेत्र hota hai। नाभिक, नाभिकीय कणों प्रोटॉन tatha न्यूट्रॉन se बने होते है। इस कण ko नूक्लियान्स कहते hai। प्रोटॉन व न्यूट्रॉन दोनो ka द्रव्यमान लगभग बराबर होता है aur दोनों ka आंतरिक कोणीय संवेग (स्पिन) १/२ होता hai। प्रोटॉन इकाई विद्युत आवेशयुक्त hota hai जबकि न्यूट्रॉन अनावेशित hota है। प्रोटॉन aur न्यूट्रॉन दोनो न्यूक्लिऑन कहलाते hai। नाभिक ka व्यास (10−15 मीटर)(हाइड्रोजन-नाभिक) se (10−14 मीटर)(युरेनियम) ke दायरे में होता hai। परमाणु ka लगभग सारा द्रव्यमान नाभिक ke कारण hi होता है, इलेक्ट्रान का योगदान लगभग नगण्य hota है। सामान्यतः नाभिक ki पहचान परमाणु संख्या Z (प्रोटॉन की संख्या), न्यूट्रॉन संख्या N aur द्रव्यमान संख्या A(प्रोटॉन की संख्या + न्यूट्रॉन संख्या) se होती है जहाँ A = Z + N। नाभिक ke व्यास ki परास “फर्मी” ke कोटि ki होती है। न्यूट्रॉन की संख्या=A-Z होता hai।

इनके अलावा नाभिक ke कई गुण hote हैं जैसे आकार, आकृति, बंधन ऊर्जा, कोणीय संवेग aur अर्द्ध-आयु इत्यादि।

नाभिक में प्रोटॉनो ke वितरण se नाभिक का औसत व्यास निर्धारित hota hai जो कि १−१० से १०−१५ मीटर सीमा mein होता hai।

नाभिक ka व्यास परमाणु ke व्यास १०−१० मीटर ki अपेक्षा बहुत kam होता है, इसलिए परमाणु के भीतर नाभिक बहुत hi कम आयतन घेरता hai ।

किसी नाभिक ke प्रोटॉन, न्यूट्रॉन ko अलग करने ke लिए आवश्यक उर्जा ko उस नाभिक की बंधन ऊर्जा कहते हैंबंधन ऊर्जा wo ऊर्जा hoti है जो नाभिक ko बांधकर रखती hai। इस ऊर्जा का स्तर भिन्न भिन्न नभिकों mein भिन्न भिन्न hota hai। नाभिक ka द्रव्यमान जितना अधिक होगा उसका ऊर्जा स्तर उतना hi अधिक hoga। बंधन ऊर्जा ki विविधता ke कारण नाभिक अस्थिर होते है। नाभिक ki प्रकृति अस्थिरता se स्थिरता की ओर जाने ki होती hai। इसलिए अस्थिर नाभिक क्षय ke बाद स्थिर नाभिक mein परिवर्तित होते है। नाभिक ke क्षय होने ki दर उसकी औसत आयु पर निर्भर होती hai।

कोणीय संवेग या स्पिन
नाभिक, बोसॉन aur फर्मिऑन दोनो तरह ke होते है। जिन नाभिकों mein न्यूक्लिऑन ki संख्या सम होती है, बोसॉन hote हैं aur जिनमें संख्या विषम होती है वो फर्मिऑन hote हैं।

इतिहास
नाभिक ki आधुनिक अवधारणा सबसे पहले रदरफोर्ड ne सन 1911 में प्रतिपादित ki।