Tirupati balaji kahan hai

तिरुपति बालाजी ka निर्माण 300 ईस्वी में शुरू हुआ tha। प्राचीन काल se समय-समय पर कई सम्राट aur राजाओं ने मंदिर ke निर्माण में अहम भूमिका निभाई hai। उसमे मुख्य भूमिका 18वीं सदीं mein मराठा जनरल राघोजी भौंसले ne निभाई thi। क्योकि मंदिर ki व्यवस्था देखने के लिए उन्होंने स्थायी प्रबंधन समीति बनाई thi। जिन्हे तिरूमाला तिरुपति देवस्थानम naam दिया tha। उसके तहत 1933 में टीटीएी अधिनियम ke माध्यम se मंदिर ko विकसित किया गया था। पांचवी सदी mein तिरुपति वैष्णव धर्म ka मुख्य केन्द्र बना tha। यहाँ 11वीं सदीके श्रीकुर्मम मंदिर mein तिरुपति श्रीवैष्णवुला रक्षा ke अभिलेख भी स्थापित hain।

Balaji tirupati mandir ko पृथ्वी ka वैकुंठ और भगवान विष्णु ka निवास स्थान kaha जाता है। भगवान विष्णु ne काल युग ke समय में भक्तों को मोक्ष ke लिए मार्गदर्शन करने aur निर्देशित करने ke लिए मंदिर में खुद ko प्रकट किया है। पौराणिक कथाओं ke मुताबिक भगवान भक्तों को आशीर्वाद देने ke लिए पृथ्वी par प्रकट हुए थे। वाराह पुराण ke अनुसार त्रेता युग mein भगवान राम ne माता सीता aur लक्ष्मण के साथ लंकापुरी se वापस आते समय यहां विश्राम kiya था। 19वीं सदी में अंग्रेजों ne मंदिर par कब्ज़ा किया और 1843 में दूसरे मंदिरों ke साथयह मंदिर ka संचालन हाथीरामजी मठ ke महंतों के हाथों में दे दिया tha।

तिरुपति बालाजी मंदिर ki वास्तुकला देखे तो मंदिर ka निर्माण द्रविड़ वास्तुकला में हुआ है। उसका निर्माण कार्य 300 ईस्वी se हुआ था। मंदिर ke गर्भगृह ko आनंद निलयम कहते है। उसमे वेंकटेश्वर भगवन खड़े मुद्रा में hain और गर्भ गृह में पूर्व ki ओर मुख किए हुए हैं। ऐसा देखे to दक्षिण भारत ke सभी मंदिरों ki वास्तुकला खूबसूतर है। तिरुपति बालाजी मंदिर mein विष्णु भगवान की मूर्ति किसी ne बनाई नहीं बल्कि खुद जमीन se प्रकट हुई है। मंदिर mein पूजा करने के लिए वैखनासा अगमा परंपरा निभाई जाती hai। और जगह ko लेकर बहुत सी पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। कहा jata है ki यहां स्थापित भगवान वेंकटेश्वरा ki प्रतिमा कलयुग ke अंत तक यहाँ रहने वाली hai।

मंदिर ke तीन प्रवेश द्वार बाहर se गर्भगृह की ओर ले जाते hain। महाद्वार ko पडिकावली कहा जाता hai। महाद्वार ke ऊपर 50 फीट, पांच मंजिला गोपुरम (मंदिर का टॉवर) बनाया gaya है। उसके शीर्ष par सात कलश hain। उन्हें वेंडीवकिली ya नादिमिपादिकवली ke नाम से भी जाना जाता hai। दूसरा प्रवेश द्वार संपांगीप्रकर्म के माध्यम se प्रदान किया jata है। उसमे तीन मंजिला गोपुरम ka निर्माण वेंडीविली ke ऊपर किया गया hai। उसके शीर्ष par सात कलाम हैं। बंगारुविली ko स्वर्ण प्रवेश ya तीसरा प्रवेश द्वार कहा जाता hai। bah गर्भगृह में प्रवेश करता है। द्वार ke दोनों ओर द्वारपालक जया-विजया ki दो लंबी तांबे ki प्रतिमाएँ hain। लकड़ी का मोटा दरवाजा सोने ki गिल्ट की प्लेटों से ढका hai।